वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बीच भारत में उर्वरक संकट

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत वर्तमान में गंभीर उर्वरक संकट का सामना कर रहा है। इसका प्रमुख कारण वैश्विक कीमतों में तीव्र वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान है, जो भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न हुए हैं। विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य क्षेत्र में अमेरिका–इज़राइल बनाम ईरान संघर्ष ने स्थिति को अधिक जटिल बना दिया है।

संकट की प्रकृति

  • कीमतों में तीव्र वृद्धि: यूरिया की कीमतें अल्प अवधि में लगभग दोगुनी हो गई हैं। फरवरी में प्रति टन लगभग $508 से अप्रैल में यह बढ़कर $935 प्रति टन तक पहुँच गई।
    • इनपुट सामग्री की महँगाई: सल्फर और अमोनिया जैसी कच्ची सामग्रियों की कीमतों में भी तीव्र वृद्धि हुई है, जिससे उत्पादन लागत अत्यधिक बढ़ गई है।
  • उच्च आयात निर्भरता: भारत प्रतिवर्ष 39–40 मिलियन टन यूरिया का उपभोग करता है, जिसमें से लगभग 25% आयातित होता है।
    • खाड़ी देशों से भारत के लगभग 40% यूरिया आयात होते हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण आपूर्ति श्रृंखला असुरक्षित हो जाती है।
    • भारत अपने घरेलू यूरिया उत्पादन हेतु 60% से अधिक तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) पश्चिम एशिया से आयात करता है।
  • उर्वरक उपयोग में संरचनात्मक असंतुलन: भारत में कुल उर्वरक खपत का लगभग 55% हिस्सा यूरिया है।
    • सब्सिडी नीतियाँ और मूल्य नियंत्रण ने अन्य पोषक तत्वों की तुलना में यूरिया के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा दिया है।

उर्वरक क्या हैं?

  • उर्वरक अकार्बनिक रसायनों से बने सघन पौध पोषक तत्व होते हैं।
  • जैविक खाद की तुलना में इनमें पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं और इन्हें कम मात्रा में प्रयोग किया जाता है।

सब्सिडी ढाँचा एवं मूल्य निर्धारण

  • यूरिया सब्सिडी योजना: इस योजना के अंतर्गत किसानों को यूरिया अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर उपलब्ध कराया जाता है।
    • 45 किलोग्राम यूरिया की थैली का MRP ₹242 है (नीम कोटिंग एवं करों को छोड़कर), जबकि वास्तविक लागत लगभग ₹3,000 होती है।
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी नीति (NBS): इसका उद्देश्य संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना है।
    • इसमें सब्सिडी को अंतिम उत्पाद के बजाय पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर) की मात्रा से जोड़ा जाता है।

सरकार की पहलें

  • NBS योजना (2010): फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित निश्चित सब्सिडी।
  • वन नेशन वन फर्टिलाइज़र योजना: ब्रांडिंग में एकरूपता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु लागू।
  • पीएम-प्रणाम योजना: राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को वैकल्पिक उर्वरकों और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रोत्साहन।

आगे की राह

  • क्षमता विस्तार: “आत्मनिर्भर भारत” के अंतर्गत घरेलू यूरिया संयंत्रों का शीघ्र संचालन आयात निर्भरता कम करेगा।
  • सतत प्रथाएँ: नैनो-यूरिया, जैव-उर्वरक और मृदा स्वास्थ्य कार्ड का व्यापक उपयोग रासायनिक उर्वरकों की तीव्रता घटा सकता है।
  • आपूर्ति श्रृंखला सुदृढ़ीकरण: आयात स्रोतों का विविधीकरण और रणनीतिक भंडार का निर्माण भविष्य के व्यवधानों से निपटने में सहायक होगा।
  • बायोस्टिमुलेंट्स को बढ़ावा: ये पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाते हैं और पौधों के चयापचय में सुधार करते हैं।
    • इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो सकती है और उनकी दक्षता बढ़ सकती है।

स्रोत: IE

 

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